विश्व हिंदी दिवस पर आभासी विचार गोष्ठी, डिजिटलीकरण पर हुआ गंभीर विमर्श
विश्व हिंदी दिवस पर विश्व हिंदी परिषद, पश्चिम बंगाल द्वारा आयोजित आभासी विचार गोष्ठी में डिजिटलीकरण और हिंदी के भविष्य पर देश-विदेश के विद्वानों ने गहन विमर्श किया।
कोलकाता | 10 जनवरी | विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर विश्व हिंदी परिषद की पश्चिम बंगाल इकाई द्वारा आयोजित आभासी विचार गोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों ने ‘डिजिटलीकरण का हिंदी पर प्रभाव’ विषय पर गहन और बहुआयामी विमर्श किया। वक्ताओं ने डिजिटल माध्यमों से हिंदी के वैश्विक विस्तार को स्वीकारते हुए भाषा की मौलिकता, परंपरा और साहित्यिक गंभीरता को बनाए रखने पर बल दिया।
विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर 10 जनवरी को विश्व हिंदी परिषद, पश्चिम बंगाल इकाई द्वारा एक भव्य आभासी विचार गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस ऑनलाइन कार्यक्रम में भारत के विभिन्न प्रदेशों के साथ-साथ विदेशों से भी हिंदी प्रेमियों और विद्वानों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। लगभग 90 प्रतिभागियों ने इस वैचारिक संवाद में सक्रिय रूप से भाग लिया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. शिप्रा मिश्रा रहीं। विशिष्ट अतिथि के रूप में काजी नज़रुल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से जुड़े डॉ. विजय कुमार भारती उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व भारती विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. रामेश्वर मिश्रा ने की।
कार्यक्रम का संचालन पश्चिम बंगाल इकाई के शैक्षणिक प्रकोष्ठ की उपाध्यक्ष प्रणति ठाकुर ने किया। उद्घाटन गणेश वंदना के साथ इकाई की महामंत्री सीमा शर्मा द्वारा हुआ, जबकि सरस्वती वंदना प्रणति ठाकुर ने प्रस्तुत की। स्वागत वक्तव्य शैक्षणिक प्रकोष्ठ की अध्यक्षा श्वेता गुप्ता ‘श्वेतांबरी’ ने दिया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रदेश मीडिया प्रभारी विनोद यादव द्वारा किया गया।
गोष्ठी का केंद्रीय विषय ‘डिजिटलीकरण का हिंदी पर प्रभाव’ रहा। वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को वैश्विक मंच प्रदान किया है और इसकी पहुंच ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों तक बढ़ी है।
सीमा शर्मा ने कहा कि डिजिटलीकरण ने हिंदी को अधिक रोचक, सुलभ और संवादात्मक बनाया है।
डॉ. आशीष कुमार साव ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से अनुवाद प्रक्रिया को सरल बताते हुए उसकी निरंतर समीक्षा की आवश्यकता रेखांकित की।
डॉ. प्रवेश त्रिपाठी ने डिजिटल युग में स्वचालित लेखन की बढ़ती भूमिका और उसके साहित्यिक प्रभावों पर चर्चा की।
मुख्य अतिथि डॉ. शिप्रा मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि वैश्विक स्तर पर हिंदी का विस्तार उत्साहजनक है, किंतु पारंपरिक हिंदी धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता रेखांकित करते हुए कहा कि डिजिटल युग में भी शब्दों की सार्थक पहचान कराने वाले मार्गदर्शकों की आवश्यकता बनी हुई है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. विजय कुमार भारती ने कहा कि हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में शामिल होने की ओर अग्रसर है, परंतु डिजिटलीकरण के कारण भाषा की गुणवत्ता और लेखन की मौलिकता प्रभावित हुई है। उन्होंने माना कि डिजिटल मंचों ने हिंदी पुस्तकालयों को घर-घर तक पहुंचाया है, लेकिन गंभीर साहित्य और मौलिक पुस्तकों का विकल्प AI नहीं हो सकता।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. डॉ. रामेश्वर मिश्रा ने कहा कि हिंदी के अनेक रूप हैं और यह किसी भी भाषा के विरोध में नहीं है। उन्होंने भारत की सभी भाषाओं के सम्मान और सह-अस्तित्व पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ भाषाई संवेदनशीलता बनाए रखना समय की मांग है।
कार्यक्रम में देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों और विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें डॉ. कृष्ण कुमारी, डॉ. रामचंद्र स्वामी, डॉ. सुरभि श्रीवास्तव, डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, रुद्रकांत झा, रावेल पुष्प, डॉ. उर्वशी श्रीवास्तव, डॉ. अशोक कुमार भार्गव सहित अनेक नाम शामिल रहे। दक्षिण अफ्रीका से दिनेश प्रसाद सिन्हा की सहभागिता ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय आयाम प्रदान किया।
यह विचार गोष्ठी विश्व हिंदी परिषद के महासचिव डॉ. विपिन कुमार के संरक्षण में सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
What's Your Reaction?

