अनंत शक्ति का उद्घोष: स्वामी विवेकानंद और भारत की जागृत ज्योति

स्वामी विवेकानंद का जीवन, दर्शन और युवाओं के लिए उनका संदेश एक विस्तृत संपादकीय जो आज के भारत और विश्व में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।

Jan 12, 2026 - 07:04
Jan 11, 2026 - 20:07
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अनंत शक्ति का उद्घोष: स्वामी विवेकानंद और भारत की जागृत ज्योति
शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद

भारत की सनातन आत्मा जब-जब संकट, आत्मग्लानि और दिशाहीनता से घिरी, तब-तब इतिहास ने ऐसे महापुरुष को जन्म दिया जिसने उसे जाग्रत किया। 12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानंद ऐसे ही युगद्रष्टा थे। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, वे भारत की चेतना का तेजस्वी उद्घोष थे। उनका जीवन एक अनंत मशाल की भाँति है, जिसकी लौ समय की आँधियों में भी बुझी नहीं।

नरेंद्र से विवेकानंद तक: आत्मबोध की यात्रा

कोलकाता में नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में जन्मे विवेकानंद बाल्यकाल से ही तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक प्रश्नाकुलता और सत्य की प्यास से ओत-प्रोत थे। ईश्वर और सत्य की खोज उन्हें अंततः रामकृष्ण परमहंस तक ले गई। यह भेंट केवल गुरु-शिष्य संबंध नहीं थी, बल्कि भारत की आत्मा और उसके भावी प्रवक्ता का मिलन था। रामकृष्ण ने उनके भीतर छिपे उस सूर्य को पहचान लिया, जो आगे चलकर विश्व को आलोकित करने वाला था।

शिकागो का उद्घोष और भारत का वैश्विक उदय

1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में विवेकानंद का संबोधन भारत के आत्मसम्मान का वैश्विक क्षण था। जब उन्होंने ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ कहकर सभा को संबोधित किया, तो वह केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि मानवता के सार्वभौमिक बंधुत्व का उद्घोष था। वेदांत, सहिष्णुता और धार्मिक समन्वय का उनका संदेश आज के संघर्षग्रस्त विश्व में और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह क्षण भारत के लिए केवल सांस्कृतिक विजय नहीं था, यह आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना थी।

धर्म, सेवा और ‘दरिद्र नारायण’

विवेकानंद का धर्म कर्मकांड की सीमाओं से परे था। उनके लिए सच्चा धर्म था मानव सेवा। ‘दरिद्र नारायण' की अवधारणा ने अध्यात्म को जीवन से जोड़ा। 1897 में स्थापित रामकृष्ण मिशन इसी दर्शन का संस्थागत रूप है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के माध्यम से आज भी मानवता की सेवा में अग्रणी है।

आत्मविश्वास का मंत्र और औपनिवेशिक भारत

औपनिवेशिक दासता से कुंठित भारत को विवेकानंद ने आत्मग्लानि से मुक्त होने का मंत्र दिया, अपने को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।” यह वाक्य राष्ट्र की नसों में दौड़ती बिजली था। उन्होंने भारत को उसकी वास्तविक शक्ति आत्मा का स्मरण कराया। उनके शब्दों में ओज था, दृष्टि थी और भविष्य की स्पष्टता थी।

युवा शक्ति और राष्ट्र-निर्माण

स्वामी विवेकानंद का युवाओं पर अटूट विश्वास था। उनका कथन, मुझे सौ ऊर्जावान युवा दो, मैं भारत का पुनर्निर्माण कर दूँगा” आज के भारत में और भी अर्थवान हो उठता है। विशाल युवा आबादी वाले देश के लिए यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि नीति-सूत्र है। वे युवाओं को स्वप्नदर्शी नहीं, कर्मशील संकल्पवान बनाना चाहते थे।

शिक्षा: चरित्र-निर्माण का माध्यम

विवेकानंद के लिए शिक्षा सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का साधन थी। आज जब शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित होती जा रही है, उनके विचार हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को निर्भीक, नैतिक और आत्मनिर्भर बनाए।

कालातीत चेतना

स्वामी विवेकानंद का जीवनकाल संक्षिप्त था, किंतु उनकी चेतना कालातीत है। वे हर युग में तब जन्म लेते हैं, जब समाज को दिशा चाहिए होती है। उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, आत्मपरीक्षण का क्षण है कि क्या हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतार पा रहे हैं? स्वामी विवेकानंद भारत की आत्मा में उदित हुआ वह सूर्य हैं, जिसकी किरणें आज भी विश्व को आलोकित कर रही हैं। सच्ची श्रद्धांजलि पुष्पांजलि में नहीं, उनके विचारों को जीवन में उतारने में है। उनकी अमर वाणी ‘तुम अनंत शक्तियों के स्वामी हो’ आज भी हर निराश मन को आशा से भर देती है।

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