खजराना थाना: 1,250 केस, दो गवाह, कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल
इंदौर के खजराना पुलिस स्टेशन में 1,250 मामलों में केवल दो व्यक्तियों को गवाह बनाए जाने का खुलासा। हत्या, पोक्सो, एनडीपीएस जैसे मामलों में यह पैटर्न पुलिसिंग और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इंदौर। खजराना थाना। भारतीय न्याय व्यवस्था में कहा जाता है, “सत्य की कई आवाज़ें होती हैं।” लेकिन इंदौर के खजराना थाना ने इस कहावत को संक्षिप्त कर दिया है। यहाँ सत्य की आवाज़ें दो ही हैं नवीन और इरशाद।
सूत्रों व सामने आए दस्तावेज़ों के अनुसार, खजराना थाना क्षेत्र में दर्ज करीब 1,250 आपराधिक मामलों में इन्हीं दो व्यक्तियों को लगातार, नियमित और लगभग अनिवार्य रूप से गवाह बनाया गया। अपराधों की सूची साधारण नहीं इसमें हत्या, बलात्कार, पोक्सो, एनडीपीएस, लूट, मारपीट जैसे गंभीर अपराध शामिल बताए जाते हैं।
यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक संस्थागत पैटर्न की ओर इशारा करता है।
गवाह या ‘सार्वकालिक उपस्थिति रजिस्टर’?
सवाल यह नहीं कि नवीन और इरशाद गवाह क्यों बने। सवाल यह है कि
- क्या वे एक साथ 1,250 घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी हो सकते हैं?
- क्या वे दिन-रात, हर गली-हर वारदात में मौजूद थे?
- या फिर खजराना थाना ने गवाही को भी स्टॉक आइटम बना दिया?
व्यंग्य यह है कि यदि भविष्य में कोई अपराध अंतरिक्ष में भी घटे, तो संभव है एफआईआर में गवाह कॉलम पहले से भरा मिले।
गंभीर धाराएँ, हल्की प्रक्रिया?
इन मामलों में जिन धाराओं का उल्लेख है, वे न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं, जहाँ एक गवाह की विश्वसनीयता से किसी का जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य तय होता है।
लेकिन जब
- एक ही व्यक्ति दर्जनों मामलों में ‘मौक़े पर मौजूद’ दिखे
- कभी पंचनामा, कभी गिरफ्तारी, कभी बरामदगी हर जगह वही नाम
- और कुछ मामलों में स्वयं गवाह यह कहें कि “हमें नहीं पता हम गवाह कब बने” तो यह सिर्फ पुलिसिया लापरवाही नहीं, बल्कि न्यायिक नैतिकता का संकट बन जाता है।
दस्तख़त या डिज़ाइन?
जाँच में यह पहलू भी सामने आया कि
- कई प्रकरणों में गवाहों के हस्ताक्षर एक जैसे पैटर्न में पाए गए
- कुछ केस डायरी में गवाही की भाषा हूबहू समान है
- तारीखें बदलीं, केस बदले, लेकिन गवाह का कथन वही रहा
यह स्थिति अदालतों के लिए भी असहज है, क्योंकि कानून गवाही को मानवीय अनुभव मानता है, न कि कॉपी-पेस्ट प्रक्रिया।
पुलिस तर्क बनाम सार्वजनिक तर्क
प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया कि
- गवाह स्थानीय हैं
- अपराधों के समय “उपस्थित” हो सकते हैं
- जाँच की जा रही है
लेकिन 1,250 मामलों का पैमाना इस तर्क को कमजोर करता है। यह संख्या ‘संयोग’ नहीं, बल्कि प्रणालीगत सुविधा का संकेत देती है।
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी की पृष्ठभूमि
देश की शीर्ष अदालत पहले भी तथाकथित ‘पॉकेट गवाह’, ‘स्टॉक विटनेस’ और ‘पुलिस-प्रेरित गवाही’ पर कड़ी टिप्पणियाँ कर चुकी है।
न्यायालय का स्पष्ट मत रहा है- “यदि गवाह स्वतंत्र न हो, तो मुकदमा निष्पक्ष नहीं हो सकता।” खजराना का मामला इसी चेतावनी का जीवंत उदाहरण बनता दिख रहा है।
पीड़ित, आरोपी और न्याय तीनों संकट में
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा नुकसान तीन पक्षों को होता है-
1. पीड़ित - जिनके मामलों की विश्वसनीयता कमजोर होती है
2. आरोपी - जिन्हें संदिग्ध गवाही के आधार पर जेल जाना पड़ सकता है
3. न्याय प्रणाली - जिसकी साख पर प्रश्नचिह्न लगते हैं
व्यवस्था अगर सुविधा-आधारित हो जाए, तो न्याय आकस्मिक बन जाता है।
कड़वा सच
अगर यही मॉडल जारी रहा, तो शायद पुलिस प्रशिक्षण में नया अध्याय जुड़ जाए ‘गवाह प्रबंधन: दो नाम काफी हैं’ पर वास्तविकता यह है कि यह मामला केवल खजराना थाना का नहीं, बल्कि भारतीय पुलिसिंग संस्कृति में गवाही की भूमिका पर पुनर्विचार की माँग करता है।
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