कार्बन-मुक्त शक्ति का महाविधान : भारत की ऊर्जा क्रांति

शांति विधेयक 2025 भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में ऐतिहासिक बदलाव लाता है। निजी भागीदारी, तकनीकी नवाचार और संतुलित नियमन के साथ यह 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का मार्ग प्रशस्त करता है, जो आत्मनिर्भर भारत और नेट-ज़ीरो भविष्य की आधारशिला बनेगा।

Dec 17, 2025 - 07:00
Dec 17, 2025 - 07:00
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कार्बन-मुक्त शक्ति का महाविधान : भारत की ऊर्जा क्रांति
शांति विधेयक 2025 भारत की परमाणु ऊर्जा क्रांति

परमाणु शक्ति का नया सूर्योदय : भारत की संप्रभु ऊर्जा का उदय

किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसके शस्त्रागार या सैन्य बल से अधिक, उसकी ऊर्जा-क्षमता में निहित होती है। ऊर्जा केवल रोशनी नहीं, बल्कि उद्योग, नवाचार, रोजगार, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय संप्रभुता की आधारशिला होती है। जो देश ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भर होता है, उसकी नीतियाँ भी परोक्ष रूप से दूसरों के हितों से संचालित होने लगती हैं। भारत, जो इक्कीसवीं सदी में एक निर्णायक वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, अब इस बुनियादी सत्य को नीतिगत साहस में बदलता दिख रहा है।

दिसंबर 2025 में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत और 15 दिसंबर को लोकसभा में प्रस्तुत शांति विधेयक (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) इसी साहस का प्रमाण है। यह विधेयक केवल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी का कानूनी मार्ग नहीं खोलता, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति को 20वीं सदी की जड़ता से निकालकर 21वीं सदी की रणनीतिक यथार्थता में स्थापित करता है।

 नीतिगत जड़ता से निर्णायक परिवर्तन तक

भारत का परमाणु कार्यक्रम ऐतिहासिक रूप से आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और वैज्ञानिक स्वाभिमान का प्रतीक रहा है। किंतु 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के बाद यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में सीमित हो गया। राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क समयानुकूल थे, परंतु बदलते वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में वही तर्क आगे चलकर विकास में बाधा बन गए।

परिणाम यह हुआ कि आज, जब भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तब भी उसकी परमाणु ऊर्जा क्षमता केवल 8.88 गीगावाट है, कुल विद्युत उत्पादन का तीन प्रतिशत से भी कम। इसके विपरीत, अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन ने परमाणु ऊर्जा को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बनाया। भारत की बढ़ती बिजली मांग का बोझ कोयले पर आ पड़ा, जिसने न केवल पर्यावरणीय संकट को गहराया, बल्कि आयात, प्रदूषण और स्वास्थ्य-लागत भी बढ़ाई। शांति विधेयक इसी ऐतिहासिक ठहराव को तोड़ने का निर्णायक प्रयास है।

 100 गीगावाट का लक्ष्य: सपना नहीं, रणनीति

2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का लक्ष्य किसी भावनात्मक राष्ट्रवादी नारे से अधिक, ठोस रणनीतिक आवश्यकता है। भारत की शहरीकरण, औद्योगीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था चौबीसों घंटे स्थिर और स्वच्छ बिजली की मांग करती है, जिसे सौर और पवन ऊर्जा अकेले पूरा नहीं कर सकतीं। परमाणु ऊर्जा यहाँ एकमात्र ऐसा विकल्प है जो: कार्बन-मुक्त है, 24x7 बेसलोड प्रदान करती है, भूमि और संसाधन की न्यूनतम खपत करती है, नेट-ज़ीरो 2070 की प्रतिबद्धता को व्यवहारिक रूप देने के लिए परमाणु ऊर्जा के बिना कोई यथार्थवादी रास्ता नहीं है।

 निजी भागीदारी: जोखिम नहीं, आवश्यकता

परमाणु परियोजनाएँ अत्यंत पूंजी-गहन होती हैं। एक गीगावाट क्षमता स्थापित करने में 15-20 हज़ार करोड़ रुपये तक की लागत आती है। अकेले सरकारी संसाधनों से 100 गीगावाट का लक्ष्य प्राप्त करना व्यावहारिक नहीं था।

निजी भागीदारी:

 विशाल पूंजी निवेश लाएगी, वैश्विक तकनीक और दक्ष प्रबंधन को जोड़ेगी, परियोजनाओं की समय-सीमा घटाएगी। विशेष रूप से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) भारत के लिए क्रांतिकारी सिद्ध हो सकते हैं। ये फैक्ट्री-निर्मित होते हैं, तेज़ी से स्थापित किए जा सकते हैं और औद्योगिक क्लस्टरों, दूरदराज़ क्षेत्रों तथा हाइड्रोजन उत्पादन जैसे नए उपयोगों के लिए उपयुक्त हैं।

 संतुलन की नीति: सुरक्षा भी, संप्रभुता भी

इस विधेयक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विस्तार और सुरक्षा के बीच संतुलन साधता है। एफडीआई सीमा 49% रखकर तकनीकी सहयोग को अनुमति दी गई है, पर नियंत्रण भारत के हाथ में रहेगा। ईंधन उत्पादन और परमाणु कचरा प्रबंधन जैसे संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहेंगे। नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 में प्रस्तावित संशोधन एक लंबे समय से चली आ रही बाधा को दूर करते हैं। दायित्व से जुड़ी अस्पष्टता के कारण वैश्विक आपूर्तिकर्ता भारत से दूरी बनाए हुए थे। अब भारत एक अधिक भरोसेमंद परमाणु निवेश गंतव्य बन सकता है।

 चुनौतियाँ: असली परीक्षा अब शुरू होती है। यह स्वीकार करना होगा कि विधेयक पारित होना मंज़िल नहीं, बल्कि यात्रा की शुरुआत है।

1. बीमा संरचना

   वर्तमान परमाणु बीमा पूल (≈ ₹1,500 करोड़) अपर्याप्त है। निजी निवेश के लिए व्यापक, अंतरराष्ट्रीय-मानक बीमा व्यवस्था अनिवार्य होगी।

2. ईंधन सुरक्षा

   यूरेनियम आयात पर 70% निर्भरता रणनीतिक जोखिम है। भारत के विशाल थोरियम भंडार भविष्य का समाधान हैं। थोरियम-आधारित रिएक्टर तकनीक भारत को वैश्विक अग्रणी बना सकती है।

3. मानव संसाधन

   कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों की कमी को दूर किए बिना यह क्रांति अधूरी रहेगी। निजी भागीदारी प्रशिक्षण, अनुसंधान और वैश्विक सहयोग को नई गति दे सकती है।

4. परियोजना समय-सीमा

   11-12 वर्षों की अवधि को 6-7 वर्षों तक लाना अनिवार्य है। इसके लिए नौकरशाही जटिलताओं से मुक्त, पेशेवर परियोजना प्रबंधन की आवश्यकता होगी।

 वैश्विक संदर्भ में भारत

जब चीन और रूस तीव्र गति से परमाणु क्षमता बढ़ा रहे हैं, तब भारत का यह कदम उसे रणनीतिक ऊर्जा दौड़ में मजबूती से स्थापित करता है। यह केवल बिजली उत्पादन का प्रश्न नहीं, बल्कि: ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता, जलवायु नेतृत्व और राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न है।

शांति विधेयक भारत की दीर्घकालिक सोच का उद्घोष है, जहाँ विकास और सुरक्षा विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं। यदि इसका क्रियान्वयन पारदर्शिता, अनुशासन और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ हुआ, तो यह भारत को स्वच्छ ऊर्जा महाशक्ति बनाने की दिशा में ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

जब आने वाले दशकों में 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा से प्रकाशित एक विकसित भारत साकार होगा, तब इतिहास में यह विधेयक उस परिवर्तनकारी यात्रा के प्रथम अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।

यह केवल ऊर्जा क्रांति नहीं, भारत की संप्रभु शक्ति के नए सूर्योदय की घोषणा है।

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