हिंदी मेला के छठवें दिन ‘बंधुत्व’ बना संवेदनात्मक और वैचारिक केंद्र

31वें हिंदी मेला के छठवें दिन ‘बंधुत्व’ विषय पर चित्रांकन, कविता पोस्टर, वाद-विवाद, रचनात्मक लेखन और मल्टीमीडिया प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने मानवीय मूल्यों और सामाजिक समरसता की प्रभावशाली अभिव्यक्ति की।

Dec 31, 2025 - 22:36
Dec 31, 2025 - 22:36
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हिंदी मेला के छठवें दिन ‘बंधुत्व’ बना संवेदनात्मक और वैचारिक केंद्र
चित्रांकन करते प्रतिभागी

कोलकाता, 30 दिसंबर। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन एवं भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 31वें हिंदी मेला के छठवें दिन का वातावरण रचनात्मक ऊर्जा, वैचारिक विमर्श और मानवीय सरोकारों से ओत-प्रोत रहा। ‘बंधुत्व’ जैसे व्यापक और समकालीन विषय को केंद्र में रखकर आयोजित प्रतियोगिताओं ने यह स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी सामाजिक सवालों को केवल समझ ही नहीं रही, बल्कि उन्हें अभिव्यक्त करने के नए-नए रास्ते भी खोज रही है। इस दिन शिशु वर्ग से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों के विद्यार्थियों के लिए चित्रांकन, कविता पोस्टर, समसामयिक विषयों पर वाद-विवाद, हिंदी साहित्य आधारित ज्ञान प्रतियोगिता, रचनात्मक लेखन तथा मल्टीमीडिया प्रस्तुति का आयोजन किया गया। पूरे परिसर में रंगों, शब्दों, तर्कों और विचारों की जीवंत हलचल देखने को मिली।

अतिथियों के विचार

कार्यक्रम में बतौर अतिथि एवं निर्णायक डॉ. उदयराज सिंह, प्रो. अंकन मुखर्जी, डॉ. रामप्रवेश रजक, डॉ. कृष्ण कुमार वास्तव, मती रीटा दोषी, डॉ. श्रद्धांजलि सिंह, डॉ. रंजीत संकल्प तथा शोधार्थी शुभम पांडेय उपस्थित रहे। मिशन के संरक्षक रामनिवास द्विवेदी ने कहा कि हिंदी मेला का यह मंच केवल प्रतियोगिता का मंच नहीं, बल्कि उम्मीद, संवाद और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।” डॉ. उदयराज सिंह ने कहा कि हिंदी मेला प्रतिभागियों के लिए अपनी प्रतिभा को पहचानने और समाज से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। डॉ. कृष्ण कुमार वास्तव ने 31 वर्षों की इस सांस्कृतिक यात्रा को स्मरण करते हुए कहा कि हमें इसे स्वर्ण जयंती वर्ष तक एक सशक्त सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में ले जाना है।” डॉ. रामप्रवेश रजक ने विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता और समसामयिक मुद्दों पर उनकी समझ को चमत्कृत करने वाला” बताया। डॉ. श्रद्धांजलि सिंह ने कहा कि निरंतर सहभागिता से ज्ञान के साथ-साथ आत्मविश्वास भी विकसित होता है। डॉ. रंजीत संकल्प के अनुसार हिंदी मेला ने कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों में भाषा और संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक बदलाव की नींव रखी है। शोधार्थी शुभम पांडेय ने इसे एक सांस्कृतिक सहयात्रा, जिसमें हर पीढ़ी साथ चलती है” कहा।

प्रतियोगिताओं में प्रतिभा की झलक

चित्रांकन प्रतियोगिता में शिशु वर्ग के नन्हे प्रतिभागियों ने बंधुत्व को रंगों और आकृतियों में ढाल दिया। आराध्या गुप्ता (सेंट ल्यूक डे स्कूल) को शिखर सम्मान मिला, जबकि तव्या साहा, त्रिशंजीत अधिकारी और अभिनव दास ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किए। सबसे कम उम्र की प्रतिभागी दिव्यांशी कुमारी को विशेष पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया गया।

अ वर्ग में अंकित घोष (ऑर्किड द इंटरनेशनल स्कूल) को शिखर सम्मान मिला। इस वर्ग में स्कूली विद्यार्थियों की कलात्मक परिपक्वता और सामाजिक समझ विशेष रूप से सराही गई।

कविता पोस्टर प्रतियोगिता में शब्द और दृश्य का सुंदर संयोजन देखने को मिला। गरिमा गुप्ता (डी.एन.डी.ई. होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज) को शिखर सम्मान तथा चंदा चौधरी को प्रथम पुरस्कार मिला।

वाद-विवाद प्रतियोगिता में बंधुत्व, लोकतंत्र, सामाजिक समरसता और समकालीन चुनौतियों पर गंभीर बहस हुई। वर्ग-अ में फरहान अज़ीज़ (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) और वर्ग-क में प्रतीक्षा मुखर्जी (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) को शिखर सम्मान प्राप्त हुआ।

रचनात्मक लेखन और मल्टीमीडिया प्रतियोगिता में भी युवाओं ने भाषा, विचार और तकनीक के समन्वय से प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि हिंदी आधुनिक माध्यमों में भी समान रूप से सक्षम है।

संचालन और समापन

कार्यक्रम का संचालन डॉ. इबरार खान, प्रो. लिली साह, कार्तिक बासफोर, संजना जायसवाल, सुकन्या तिवारी, श्वेता गुप्ता, उत्तम ठाकुर, विशाल साव, मो. अरबाज खान, सनी साव, रूपेश कुमार यादव, मुकेश पंडित, इशरत जहां और चंदन भगत ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुमिता गुप्ता ने प्रस्तुत किया।

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